प्रो० राम गोपाल और उद्योगपति परिमल नाथवानी सपा उम्मीदवार

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यूपी डेस्क : उत्तर प्रदेश में 10 सीटों पर हो रहे राज्यसभा चुनाव में सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने रामगोपाल यादव के साथ उद्योगपति धनराज परिमल नाथवानी को प्रत्याशी बनाया है. इन दोनों उम्मीदवारों ने बुधवार को अपना नामांकन भी दाखिल कर दिया है. राज्यसभा चुनाव में रिलायंस ग्रुप के वरिष्ठ अधिकारी और उद्योगपति धनराज परिमल नाथवानी को सपा का ‘सरप्राइज कैंडिडेट’ माना जा रहा है. हालांकि, समाजवादी पार्टी की राजनीति में यह पहली बार नहीं है जब किसी उद्योगपति या कॉरपोरेट घराने से जुड़े व्यक्ति के लिए राज्यसभा जाने का रास्ता खोला गया हो. सपा में धनी चेहरों को उच्च सदन भेजने का एक लंबा इतिहास रहा है. मुलायम सिंह यादव के दौर से लेकर अखिलेश यादव के मौजूदा दौर तक, सपा ने ‘समाजवाद’ की विचारधारा के बीच कॉरपोरेट और पूंजीपतियों के लिए संसद के उच्च सदन के दरवाजे बार-बार खोले हैं. अनिल अंबानी, ललित सूरी और संजय सेठ से लेकर धनराज नाथवानी तक एक लंबी फेहरिश्त है, जिन्हें सपा ने राज्यसभा पहुंचाया. देश के जाने-माने उद्योगपति अनिल अंबानी के समाजवादी पार्टी के साथ रिश्ते जगजाहिर रहे हैं. मुलायम सिंह यादव के साथ अनिल अंबानी की राजनीतिक केमिस्ट्री यूपी में काफी मशहूर थी. अनिल अंबानी को सपा के करीब लाने का मुख्य श्रेय अमर सिंह को जाता है. साल 2004 में मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्री रहते हुए समाजवादी पार्टी के समर्थन से अनिल अंबानी उत्तर प्रदेश से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में राज्यसभा पहुंचे थे.

संवैधानिक प्रावधानों के मुताबिक कोई व्यक्ति लाभ के पद पर रहते हुए संसद के किसी सदन का सदस्य नहीं रह सकता. अंबानी ग्रुप की बागडोर संभालने के साथ-साथ अनिल अंबानी राज्यसभा सदस्य थे और उत्तर प्रदेश विकास परिषद के सदस्य भी बनाए गए थे. ऐसे में साल 2006 में जब लाभ के पद (Office of Profit) का मुद्दा उठा, तो अनिल अंबानी ने राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था. होटल कारोबारी और उद्योगपति ललित सूरी वर्ष 2002 से 2006 तक उत्तर प्रदेश से राज्यसभा सांसद रहे. ललित सूरी किसी राजनीतिक दल के आधिकारिक सदस्य नहीं थे. उन्होंने 2002 में उत्तर प्रदेश से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर राज्यसभा चुनाव के लिए पर्चा भरा था, लेकिन वे मुख्य रूप से सपा के समर्थन से राज्यसभा सांसद बने थे. उस राज्यसभा चुनाव के दौरान अमर सिंह ने ललित सूरी की उम्मीदवारी का समर्थन कराने में प्रमुख भूमिका निभाई थी. ललित सूरी एक ऐसे उद्योगपति प्रत्याशी के रूप में उभरे, जिन्हें मुख्य समर्थन सपा का मिला, लेकिन भाजपा का भी मौन समर्थन हासिल रहा. इसके बाद 2004 में भी जब वे दोबारा मैदान में उतरे, तो मुलायम सिंह यादव ने उनके उच्च सदन जाने का रास्ता बनाया और वे सपा के समर्थन से सांसद चुने गए. उत्तर प्रदेश के प्रमुख रियल एस्टेट कारोबारी (‘शालीमार ग्रुप’ के प्रमोटर) संजय सेठ के सपा के साथ संबंध जगजाहिर रहे हैं. सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव के साथ संजय सेठ के काफी गहरे रिश्ते थे. संजय सेठ लंबे समय तक सपा के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष भी रहे और मुलायम सिंह यादव व अखिलेश यादव के करीबी नेताओं में गिने जाते थे. 2016 में समाजवादी पार्टी ने संजय सेठ को उत्तर प्रदेश से राज्यसभा सांसद बनाया था.

हालांकि, 2017 में सूबे की सत्ता से सपा के हटते ही परिस्थितियां बदल गई. अगस्त 2019 में संजय सेठ ने सपा और अपनी राज्यसभा सीट से इस्तीफा दे दिया और भाजपा में शामिल हो गए. बाद में वे भाजपा के टिकट पर राज्यसभा सांसद बने. वर्ष 2024 में जब भाजपा ने उन्हें दोबारा उम्मीदवार बनाया, तो सपा के विधायकों द्वारा की गई क्रॉस वोटिंग के सहारे वे चुनाव जीतने में सफल रहे. व्यापारी नेता बनवारी लाल कंछल भी उत्तर प्रदेश के उन प्रमुख धनाढ्य और कारोबारी पृष्ठभूमि वाले नेताओं में शामिल हैं, जिन्हें सपा ने राज्यसभा भेजा था. कंछल के सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव के साथ काफी अच्छे संबंध थे. मुलायम सिंह के दौर में सपा ने उनके जरिए उत्तर प्रदेश के वैश्य (व्यापारी) वोट बैंक और कारोबारी वर्ग को साधने का काम किया था. मुलायम सिंह यादव ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल के दौरान बनवारी लाल कंछल को 2006 में सपा के टिकट पर राज्यसभा भेजा था. हालांकि, 2009 में उन्होंने सपा छोड़कर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का दामन थाम लिया और राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया. बनवारी लाल कंछल उत्तर प्रदेश में सर्राफा व व्यापारिक संगठनों के प्रमुख चेहरा रहे हैं. अब सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने राज्यसभा के लिए उद्योगपति धनराज परिमल नाथवानी को सपा उम्मीदवार बनाया है. वे रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL) में ग्रुप प्रेसिडेंट हैं और रिलायंस न्यू एनर्जी लिमिटेड के बोर्ड में निदेशक के रूप में कार्यरत हैं. अखिलेश यादव द्वारा उन्हें अपना प्रत्याशी बनाए जाने के फैसले को सपा के कॉरपोरेट जगत से पुराने रिश्तों को फिर से मजबूत करने और राज्यसभा में उद्योगपति चेहरों को भेजने की परंपरा के विस्तार के रूप में देखा जा रहा है. विधानसभा में पर्याप्त संख्या बल होने के कारण रामगोपाल यादव के साथ-साथ धनराज नाथवानी की जीत भी तय मानी जा रही है.

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